वैदिक परंपरा में 27 नक्षत्रों का जीवन और मनोवृत्ति पर विशेष प्रभाव माना जाता है। प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण (पाद) होते हैं, इसलिए कुल 108 पाद बनते हैं। इसी क्रम को 108 नामों/श्लोकों वाली श्री विष्णु सहस्रनाम साधना के साथ जोड़ा जाता है।
परंपरागत रूप से प्रत्येक नक्षत्र को 4 श्लोकों के एक समूह से जोड़ा जाता है:
- अश्विनी: 1–4
- भरणी: 5–8
- कृत्तिका: 9–12
- रोहिणी: 13–16
- मृगशिरा: 17–20
- आर्द्रा: 21–24
- पुनर्वसु: 25–28
- पुष्य: 29–32
- आश्लेषा: 33–36
- मघा: 37–40
- पूर्वाफाल्गुनी: 41–44
- उत्तराफाल्गुनी: 45–48
- हस्त: 49–52
- चित्रा: 53–56
- स्वाती: 57–60
- विशाखा: 61–64
- अनुराधा: 65–68
- ज्येष्ठा: 69–72
- मूल: 73–76
- पूर्वाषाढ़ा: 77–80
- उत्तराषाढ़ा: 81–84
- श्रवण: 85–88
- धनिष्ठा: 89–92
- शतभिषा: 93–96
- पूर्वाभाद्रपद: 97–100
- उत्तराभाद्रपद: 101–104
- रेवती: 105–108
जन्म नक्षत्र के आधार पर साधना
यदि व्यक्ति को अपना जन्म नक्षत्र और पाद ज्ञात हो, तो इस पारंपरिक पद्धति में उससे संबंधित 4 श्लोकों को विशेष रूप से पढ़ने/जप करने की साधना की जाती है। सामान्य रूप से पहले श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ और उसके बाद संबंधित श्लोकों का जप किया जा सकता है।
यह साधना आध्यात्मिक अनुशासन और भक्ति की परंपरा के रूप में देखना उचित है; इसके परिणामों को निश्चित या वैज्ञानिक रूप से सिद्ध लाभ के रूप में नहीं लेना चाहिए।
